
राजस्थान का इतिहास : प्राचीन काल (History of Rajasthan)
राजस्थान के इतिहास की शुरुआत प्रागैतिहासिक काल से होती है इस अध्याय में हम राजस्थान के प्रागैतिहासिक काल से मध्य काल तक के इतिहास का अध्ययन करेंगे जिसे हमने निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित किया है|
कर्नल जेम्स टॉड को राजस्थान के इतिहास का प्रणेता कहा जाता है
पाषाण काल
- पाषाण काल का समय लगभग 25 लाख ई.पू. से 1000 ई.पू. तक माना जाता है पाषाण काल को तीन भागो में विभाजित किया गया है पुरा पाषाण काल, मध्य पाषाण काल एवं नव पाषाण काल|
- राजस्थान में पाषाण के अवशेष अजमेर , चित्तौरगढ़, भीलवाड़ा, जालौर, टोंक, अलवर, उदयपुर, जयपुर आदि स्थानों से मिले है
कालीबंगा व आहड़ संस्कृति
- कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है काले रंग की चूड़ियाँ जो गंगानगर के निकट सरस्वती-घग्गर नदियों के किनारे बसा था
- कालीबंगा की खोज सबसे पहले अमलानंद घोष ने 1951 में की थी और इसका उत्खलन कार्य बी.के. थापर व बी.पी. लाल के निर्देशन में किया गया|
- कालीबंगा से हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिले है
- आहड़ राजस्थान के उदयपुर के निकट बनास नदी घटी में स्थित था आहड़ के आस पास तांबा बहुत अधिक मात्र में पाया जाता था इसलिए इसे तम्रावती य ताम्बवती के नाम से भी जाना जाता था
- आहड़ स्थल का उत्खलन ए.के.व्यास , एच.डी. सांकलिया के निर्देशन में किया गया
- आहड़ संस्कृति का काल लगभग 2100 से 1500 ई.पू. तक माना जाता है
महाजनपद काल
- प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदो में से दो महाजनपद मत्स्य व अवन्ती राजस्थान में स्थित थे
- मतस्य महाजनपद का संस्थापक राजा विराट था इसी के नाम पर इसकी राजधानी का नाम विराटनगर रखा गया था
- अवन्ती महाजनपद के दो भाग थे उत्तरी अवन्ती व दक्षिणी अवन्ती
- उत्तरी अवन्ती की राजधानी उज्जियनी तथा दक्षिणी अवन्ती की राजधानी महिष्मति थी
- अवन्ती का राजा चंडप्रघोत महात्मा बुद्ध का समकालीन था
राजस्थान का इतिहास : मध्य काल (History of Rajasthan)
राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का काल 650 से 1682 ई. तक मन जाता है इस समय राजस्थान छोटे – छोटे राज्यों में विभक्त था और अधिकांस हिस्सों में राजपूतो का शासन था राजस्थान में शासन करने वाले प्रमुख राजपूत वंश चौहान , प्रतिहार, परमार, सोलंकी य चौलुक्य, राठोर, गुहिलोत, कछवाहा ,भाटी और तोमर आदि थे
राजस्थान का चौहान वंश
राजस्थान के चौहान वंश का नामकरण ‘चाहमान’ नामक व्यक्ति के नाम पर हुआ है जो इस वंश का आदिपुरुष था चौहान राजस्थान के विभिन्न स्थानों पर निवास करते थे और सभी जगह अलग – अलग राजा थे |
सांभर (शाकम्भरी) के चौहान
- चौहानों के शाकम्भरी वंश का संस्थापक वासुदेव था इसी ने सांभर झील का निर्माण कराया था
- शाकम्भरी वंश के अन्य प्रमुख राजा अजयराज, अर्णेराज , विग्रहराज , अपरागंगेय ,पृथ्वीराज II, पृथ्वीराज III , सोमेश्वर आदि थे
- चौहान वंश के शासक अजयपाल ने राजस्थान में अजमेर नगर की स्थापना की और वहां तारागढ़ नामक किले का निर्माण करवाया
- अजयपाल ने अजयप्रियद्रम्स नामक सिक्के जारी किये
- अजयपाल ने लगभग 1133 ई. से 1153 ई. तक शासन किया
- अजयपाल के बाद अर्णेराज चौहान राज्य का शासक बना उसने सिन्धु तथा सरस्वती नदी तक चौहान राज्य का विस्तार किया उसने अजमेर के निकट हुए युद्ध में सुलतान महमूद की सेना को पराजित किया
- अर्णेराज के शाशन के बाद जग्गदेव कुछ समय के लिए चौहान वंश का शासक बना जग्गदेव के बाद विग्रह राज IV चौहान वंश का शासक बना उसके काल को चौहान वंश का स्वर्ण काल कहा जाता था
- विग्रह राज IV का शासनकाल 1153 से 1163 ई. तक था
- विग्रह राज IV ने अजमेर में संस्कृत विश्वविध्यालय की स्थापना की जिसे ऐबक ने बाद में तुड़वाकर अढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण करवाया
- विग्रह राज IV को बीसल देव नाम से भी जाना जाता है उसके बीसलपुर नगर को बसाया और वहां बीसलसर झील का निर्माण भी करवाया
- विग्रह राज IV के बाद
- अपरागंगेय ,पृथ्वीराज II, पृथ्वीराज III , सोमेश्वर आदि चौहान वंश के शासक बने
- पृथ्वीराज III को “राय पिथौरा” भी कहा जाता था
नाडौल के चौहान
- चौहानों के नाडौल वंश का संस्थापक लक्ष्मण था
- इस वंश के अन्य शासक सोभित, बलराज, महेंद्र, बाल प्रशाद, पृथ्वीपाल आदि थे
जालौर के चौहान
- इस वंश की स्थापना कीर्तिपाल ने की |
सिरोही के चौहान
- सिरोही के चौहान वंश की स्थापना लुंबा ने की उसके बाद तेज सिंह, सामंत सिंह , सल्खा, शिवभान इस वंश के प्रमुख शासक हुए
- शिवभान के पुत्र सहसमल ने सिरोही नगर की स्थापना की और उसी को अपनी राजधानी बनाया
राजस्थान का प्रतिहार वंश
- प्रतिहार स्वयं को लक्ष्मण का वंशज मानते है जो राम के प्रतिहार अर्थात द्वारपाल थे
- प्रतिहारो की सबसे प्राचीन शाखा मंडौर शाखा थी जिसका संस्थापक हरिशचंद्र था
- प्रतिहारो की सबसे प्रचलित शाखा जालौर शाखा थी जिसका संस्थापक नागभट्ट I था
राजस्थान का परमार/पंवार वंश
- राजस्थान में प्रतिहार वंश के बाद परमार वंश का शासन हुआ परमारों की दो महत्वपूर्ण शाखाएं आबू व मालवा है
- परमारों की आबू की शाखा का संस्थापक उल्पराज I था
- परमारों की मालवा शाका का प्रथम शासक सीअक द्वितीय या श्री हर्ष था जिसकी राजधानी उज्जैन थी
